चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है और यह चार महीने के बाद देवउठनी एकादशी पर खत्म होता है। चातुर्मास अर्थात 4 महीनों की ऐसी अवधि जब भगवान विष्णु अपनी योग निद्रा में चले जाते हैं। ऐसे में सनातन धर्म में इस दौरान कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से चातुर्मास या चौमासा की ये अवधि शुरू होती है और कार्तिक माह की एकादशी तिथि को इसका समापन हो जाता है।

कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि, आखिर चातुर्मास के दौरान मांगलिक कार्य वर्जित क्यों होते हैं? एस्ट्रोसेज एआई के इस ब्लॉग में हम आपको इस सवाल का जवाब तो देंगे ही साथ ही जानेंगे कि इस वर्ष चातुर्मास कब से प्रारंभ हो रहा है? चातुर्मास के दौरान क्या कुछ कार्य करने से व्यक्ति को शुभ फल की प्राप्ति होती है और इस दौरान क्या करना चाहिए एवं किन कार्यों से बचना चाहिए? तो चलिए शुरू करते हैं यह खास ब्लॉग और सबसे पहले जान लेते हैं चातुर्मास इस वर्ष कब से शुरू हो रहा है।
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चातुर्मास कब से कब तक है
जैसा कि हमने पहले भी बताया कि आषाढ़ माह में आने वाली देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू हो जाएगा और यह कार्तिक माह की देवउत्थान एकादशी पर समाप्त होगा। वर्ष 2026 में चातुर्मास 27 जुलाई, 2026 से शुरू होकर 20 नवंबर को खत्म होगा।
चातुर्मास में व्रत कैसे रखते हैं
- चातुर्मास का अर्थ है चार माह और इन चार महीनों में खानपान का विशेष ध्यान रखा जाता है। कई लोग इस दौरान मांसाहारी भोजन का सेवन नहीं करते हैं। वहीं कुछ लोग चातुर्मास के व्रत में एक समय खाना खाते हैं। इस समय कुछ विशेष खाद्य पदार्थ जैसे कि गुउ़ या तेल का सेवन करने से परहेज़ किया जाता है। वहीं कुछ लोग मीठा और नमकीन खाने से बचते हैं।
- जो लोग इस दौरान सख्त व्रत रखने का संकल्प लेते हैं और व्रत रखते हैं, वे चातुर्मास में लहसुन और प्याज़ का सेवन नहीं करते हैं क्योंकि इससे मन उत्तेजित हो सकता है।
- चातुर्मास के व्रत को लेकर कोई सख्त नियम नहीं है। यह भक्त पर निर्भर करता है कि वो इन चार महीनों को कैसे बिताना चाहता है।
- कुछ लोग इस दौरान महाभारत या रामायण या गीता या भागवत् पुराण का पाठ करते हैं। कुछ भक्त इन चार महीनों के दौरान रोज़ मंदिर जाते हैं और धार्मिक कार्य करते हैं।
- भगवान विष्णु के भक्तों के लिए चातुर्मास बहुत महत्व रखता है। इस समय विष्णु जी के भक्त उनकी कथाएं सुनते हैं और गरीब लोगों की मदद करते हैं एवं विष्णु मंदिर जाते हैं।
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चातुर्मास के चार महीनों में क्या न खाएं
इन चार महीनों में स्वस्थ शरीर बनाए रखने को महत्व देना चाहिए। चातुर्मास के पहले दो महीनों में मानसून अपने चरम पर रहता है और इस वजह से कुछ क्षेत्रों में हरी पत्तेदार सब्जियों से परहेज़ किया जाता है। सावन में हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खाई जाती हैं और भाद्रपद माह में दही या दही से बनी चीज़ें वर्जित होती हैं। अश्विन माह में दूध और कार्तिक मास में दालें खाने से मना किया जाता है।
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चातुर्मास के पहले महीने में शाक व्रत
चातुर्मास व्रत के पहले महीने को शाक व्रत कहा जाता है। आषाढ़ महीने में शुक्ल पक्ष में द्वादशी तिथि को शाक व्रत की शुरुआत होती है और सावन मास में शुक्ल एकादशी के दिन इसका समापन होता है।
शाक व्रत
27 जुलाई से शाक व्रत शुरू होगा और यह 22 अगस्त को खत्म होगा। इस एक महीने में चातुर्मास्य व्रत रखने वाले लोगों को फल, सब्जियां, मसाले और सूखे मेवे खाने से परहेज़ किया जाता है। इस समय काली मिर्च, जीरा, रवा, तिल के बीज, घी, दूध, दही और मक्खन खाया जाता है।
शाक व्रत के दौरान सब्जियां और फल उपयोग में नहीं लाई जाती हैं। इसके अलावा इस समय सरसों, लाल मिर्च, हल्दी, इमली, मेथी, धनिया, करी पत्ता, अदरक, हरी मिर्च और नींबू भी वर्जित होता है।
ऐसा माना जाता है कि इन चार महीनों में व्रत रखने से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। यही वजह है कि पहले महीने में मसाले और सूखे मेवे खाने से मना किया जाता है। वराह पुराण में भी चातुर्मास व्रत के महत्व का उल्लेख किया गया है।
दधि व्रत
इसके बाद दूसरे महीने में दधि व्रत आता है जो कि सावन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी से शुरू होकर भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर खत्म होता है। यह एक महीने का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह 23 अगस्त, 2026 से शुरू होगा और 22 सितंबर को खत्म होगा। इस महीने में दही से बनी ची़जों से परहेज़ करने की सलाह दी जाती है। इस व्रत का समापन भाद्रपद में आने वाली परिवर्तनी एकादशी पर होता है।
क्षीर व्रत
चातुर्मास्य व्रत में तीसरे महीने में क्षीर व्रत रखा जाता है। यह व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को शुरू होता है और अश्विन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर खत्म होता है। यह व्रत भी भगवान विष्णु को समर्पित होता है। क्षीर व्रत 23 सितंबर, 2026 को शुरू होकर 22 अक्टूबर, 2026 को खत्म होगा। इस एक महीने में दूध से बनी चीज़ों का परहेज़ किया जाता है जिसमें पनीर, दही, मक्खन, घी आदि शामिल हैं।
द्विदल व्रत
इसके बाद चातुर्मास के आखिरी महीने में द्विदला व्रत रखा जाता है। यह व्रत अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक होता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 23 अक्टूबर से लेकर 20 नवंबर तक रहेगा। द्विदला व्रत को भाऊबीज व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
इस एक महीने में दाल और बीज नहीं खाए जाते हैं। इसमें काली मसूर की दाल, मूंग की दाल, काले चने और लाल मसूर की दाल शामिल है। कुछ लोग इस समय हरी पत्तियों और ज्यादा बीज वाली सब्जियों का सेवन करने से भी बचते हैं।
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चातुर्मास 2026 व्रत रखने के लाभ
इस व्रत को करने का प्रमुख उद्देश्य शरीर की आवश्यकताओं को सीमित करना और अपनी इंद्रियों के सुख को कम करना है। इस व्रत को करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है, श्री कृष्ण की कृपा मिलती है और भक्ति सेवा में उन्नति होती है।
जो व्यक्ति इन चार महीनों में तपस्या करता है, वह सोम रस पीने का पात्र बन जाता है। वह अमर एवं सदा के लिए सुखी हो जाता है। भगवान कृष्ण के भक्त भौतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि अपनी भक्ति सेवा को बढ़ाने के लिए चातुर्मास का व्रत रखते हैं।
चातुर्मास 2026 में होने वाली ऐतिहासिक घटनाएं
शास्त्रों में चातुर्मास के दौरान घटित हुई कई ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। इन घटनाओं से चातुर्मास का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
नारद मुनि की कथा: श्रीमद् भागवत में इस घटना का उल्लेख मिलता है। नारद मुनि पिछले जन्म में एक दासी के पुत्र के रूप में पैदा हुए थे और वह एक शूद्र परिवार में थे। उन्हें चातुर्मास के दौरान महान भक्तों की सेवा करने का अवसर मिला और उन्होंने उन भक्तों का महाप्रसाद भी ग्रहण किया। इससे उन्हें इसी जीवन में भगवान कृष्ण के दर्शन प्राप्त हुए। यहीं से धीरे-धीरे ईश्वर के प्रति उनका प्रेत और आसक्ति बढ़ गई और अगले जन्म में वह ब्रह्मा जी के पुत्र नारद मुनि बन गए।
श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर में प्रवेश: एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से अपने राज्य हस्तिनापुर में रुकने का अनुरोध किया। इस दौरान श्रीकृष्ण चातुर्मास में हस्तिनापुर रूके थे।
श्रील माधवेंद्र जगन्नाथ पुरी में रूके: पुरी के आराध्य देव श्रील माधवेंद्र से श्री गोपाल ने अपने विग्रह लेपन के लिए चंदन लाने को कहा, तब श्रील माधवेंद्र जगन्नाथ पुरी की यात्रा के लिए निकल पड़े और यहीं पर उन्होंने अपना चातुर्मास बिताया था।
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चातुर्मास में क्या काम भूल से भी ना करें?
चातुर्मास के चार महीनों में कुछ कार्य पूरी तरह से वर्जित होते हैं और इस दौरान भूमि पूजन, मुंडन संस्कार, विवाह, तिलक समारोह, गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार जैसे सभी मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं। इसके अलावा इस अवधि में किसी भी तरह का कोई नया काम नहीं शुरू किया जाना चाहिए। कहते हैं कि अगर चातुर्मास के दौरान कोई शुभ काम शुरू भी करें तो इससे व्यक्ति को शुभ पSरिणाम नहीं प्राप्त होते हैं।
इन चार महीनों में झूठ, छल, कपट, नशा जैसी आदतों से दूर रहें। इसके अलावा बहुत से लोग चातुर्मास के दौरान व्रत रखते हैं या विशेष साधना करते हैं। अगर आप भी ऐसा कर रहे हैं तो इस दौरान यात्रा न करें।
चातुर्मास में किन बातों का ध्यान रखें
शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास का समय काफी महत्वपूर्ण भी होता है। ऐसे में इस अवधि से संबंधित कुछ विशेष नियम और उनके महत्व बताए गए हैं जैसे कि,
- इन चार महीनों में सात्विक भोजन का ही सेवन करना चाहिए।
- इस दौरान अंडा, मछली, मांस, प्याज़, लहसुन जैसी तामसिक वस्तुओं का भोजन वर्जित माना जाता है। खान-पान के इन नियमों का पालन किया जाए तो धार्मिक दृष्टि के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी अनुकूल रहता है।
- इसके अलावा चातुर्मास के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना भी शुभ फलदायी रहता है क्योंकि इन महीनों में तामसिक प्रवृत्तियां बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं जो व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जाने का प्रयत्न करती हैं।
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चातुर्मास के नियम
चातुर्मास में विशेष तौर पर कुछ नियमों का पालन किया जाता है जिससे शारीरिक एवं आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं।
- चातुर्मास के दौरान व्रत अवश्य करें और इस दौरान भूमि पर सोएं।
- सूर्योदय से पहले उठ जाएं और अच्छे से स्नान कर के धुले वस्त्र ही पहनें।
- जितना हो सके मौन रहें। इन चार महीनों के दौरान दिन में केवल एक बार ही उत्तम भोजन करें। रात्रि में फलाहार कर लें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें। ध्यान योग और सत्संग में हिस्सा लें।
- भगवान विष्णु और शिव की उपासना करें और अपने पितरों का तर्पण करें और जितना हो सके गरीब और ज़रूरतमन्द लोगों को दान करें।
चातुर्मास के नियमों से क्या लाभ होगा
अगर आप इन चार पवित्र महीनों में उपरेाक्त नियमों का पालन करते हैं, तो इससे आपको कई तरह के लाभ मिल सकते हैं, जैसे कि:
- इससे स्वास्थ्य अच्छा रहता है और रोग में सुधार आ सकता है।
- ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। घर में ईश्वर की कृपा से सुख-समृद्धि आती है।
- मानसिक दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
- पापों का नाश होता है और मानसिक विकार दूर होते हैं और मानसिक दृढ़ता प्राप्त होती है।
- पितरों का आशीर्वाद मिलता है। महादेव और श्री हरि की कृपा प्राप्त होती है।
- भाई बंधुओं का सुख प्राप्त होता है और आत्मविश्वास, त्याग समर्पण की भावना विकसित होती है।
चातुर्मास में क्या करें
इस दौरान कुछ विशेष कार्य करने से ईश्वर की कृपा एवं पुण्य की प्राप्ति होती है।
- ये चार महीने भगवान विष्णु की पूजा करने के लिए विशेष रूप से फलदायी होते हैं। रोज़ सुबह-शाम विष्णु जी की आरती करें और हो सके तो विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भी करें। रोज़ मंदिर जाएं और प्रवचन सुनें।
- रोज़ अपने इष्ट देवों का नाम लें और उनके मंत्रों का जाप करें। ऐसा करने से मन शांत रहता है और एकाग्रता बढ़ती है।
- यह समय ध्यान करने के लिए एकदम अनुकूल है। इससे आंतरिक शांति मिलती है।
- इस समय सात्विक भोजन करने की सलाह दी जाती है। हल्का एवं सुपाच्य भोजन करें और दाल, चावल, सब्जियां एवं फल खाएं।
- आप अपने सामर्थ्य के अनुसार गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद एवं दान कर सकते हैं। इससे आपको पुण्य की प्राप्ति होगी और आपका मन शांत एवं संतुष्ट महसूस करेेगा।
- इस समय ब्रह्मचर्य का पालन करने की भी सलाह दी जाती है। यह शारीरिक एवं मानसिक शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होता है।
- इस दौरान एक समय भोजन करना अच्छा माना जाता है। मौन व्रत रखना भी उत्तम होता है।
- धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपने ज्ञान को बढ़ाएं। इससे आत्मिक उन्नति होती है।
चातुर्मास में क्या न करें
- यह समय शुभ एवं मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं होता है इसलिए इस दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और व्यापार की शुरुआत जैसे कार्य नहीं करने चाहिए। इस समय भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं जिससे इन कार्यों में विघ्न आने का डर रहता है।
- इन चार महीनों के दौरान लंबी यात्रा करने से बचना चाहिए। बाल और दाढ़ी नहीं कटवानी चाहिए। इसे भी एक तरह की तपस्या माना गया है।
- मनोरंजन, फिल्म देखना या जीवन में लग्ज़री को अधिक महत्व देने से बचना चाहिए। यह समय आत्म-संयम का होता है।
- इसके अलावा भक्ति के इस समय में किसी की निंदा न करें, किसी से झूठ न बोलें और किसी का भी अपमान न करें। अपनी वाणी पर संयम रखें और अनावश्यक बातें न करें।
चातुर्मास 2026 में ऐसे बढ़ेगा भाग्य
- चातुर्मास के दौरान कुछ विशेष कार्य करने से व्यक्ति को जीवन में तमाम तरह के शुभ परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं। जैसे:
- अगर आप अपने मान सम्मान में वृद्धि करवाना चाहते हैं तो चातुर्मास के दौरान ब्रह्म मुहूर्त में उठें, जमीन पर सोएँ। ऐसा करने से समाज में आपका मान सम्मान बढ़ेगा और बल और बुद्धि का आशीर्वाद मिलेगा।
- नौकरी में तरक्की प्राप्त करना चाहते हैं तो आप चातुर्मास के दौरान चप्पल, छाता, कपड़ों का दान करें। ऐसा करने से महादेव की प्रसन्नता हासिल होती है और आपके सभी कार्य पूरे होने लगते हैं।
- शत्रुओं से मुक्ति प्राप्त करनी है तो चातुर्मास के दौरान धार्मिक ग्रंथो या फिर मंत्रों का जाप करें। ऐसा करने से आपके जीवन की परेशानियां भी दूर होने लगेगी और आपको शत्रुओं से भी छुटकारा मिलेगा।
- अगर आपके जीवन कीमें कर्ज का बोझ बढ़ गया है तो चातुर्मास के अन्न और गोदान अवश्य करें।
- जीवन में सकारात्मकता और सुख शांति के लिए चातुर्मास के दौरान श्रीमद् भागवत का पाठ अवश्य करें।
चातुर्मास के लिए सरल उपाय
चातुर्मास की यह अवधि ध्यान साधना पूजा तप के साथ-साथ अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लेकर आने के लिए भी बेहद अनुकूल होती है। अगर आप भी अपने जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं तो नीचे हम आपको कुछ बेहद ही सरल ज्योतिषीय उपायों की जानकारी दे रहे हैं।
- इस समय अगर आप दूध, दही, घी, शहद, मिश्री और पंचामृत से भगवान विष्णु का अभिषेक करते हैं तो आपको अक्षय सुख की प्राप्ति होती है।
- इस अवधि में चांदी के बर्तन में हल्दी भरकर दान करेंगे तो इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं, आपके जीवन में धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- भगवान विष्णु के समक्ष दीप और गुग्गल जलाने से व्यक्ति के जीवन में धन की कभी भी कोई कमी नहीं रहती है।
- चातुर्मास में अन्न, वस्त्र, कपूर, छाता, चप्पल का दान करने से भोलेनाथ की कृपा से नौकरी, व्यवसाय और करियर में उन्नति मिलती है।
- अन्न और गाय का दान करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है, आय के नए स्रोत मिलते हैं और धन लाभ के योग बनते हैं।
- चातुर्मास के दौरान अपने ईष्ट देवता की पूजा करने और उनसे संबंधित मंत्रों का जाप करने से जीवन से रोग, दोष और ग्रह दोष दूर होते हैं।
- इस समय पीपल के पेड़ की सेवा अवश्य करें। प्रतिदिन पीपल पर जल चढ़ाने और दीपक जलाने से कभी ना खत्म होने वाले पुण्य की प्राप्ति होती है।
- इसके अलावा अगर आप मनोकामना पूर्ति चाहते हैं तो चातुर्मास के दौरान मां लक्ष्मी, मां पार्वती, भगवान गणेश, अपने पितृ देवों की पूजा अवश्य करें। ऐसा करने से आपके घर में खुशहाली आएगी और संतान सुख भी बनता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चातुर्मास 27 जुलाई, 2026 से शुरू होगा।
20 नवंबर को खत्म होगा।
चातुर्मास में चार महीने के लिए विष्णु जी सांसारिक कार्यों के लिए उपलब्ध नहीं होते हैं और इस समय भोलेनाथ की विशेष पूजा होती है।